श्री कष्टभंजन देव सुन्दरकाण्ड सत्संग मंडल (SKDSSM)ट्रस्ट
वावोल, गांधीनगर , गुजरात (भारत)
(Reg. No. A/1052/Gandhinagar, PAN No. - ABLTS6490A, DARPAN ID - GJ/2025/0613597)
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नाम: हनुमान (इन्हें बजरंगबली, मारुति, पवनपुत्र और अंजनीपुत्र जैसे अनेक नामों से जाना जाता है)।
अवतार: भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार।
जन्म स्थान: इसके बारे में अलग-अलग मत हैं, लेकिन सबसे प्रमुख स्थान अंजनाद्रि पर्वत (किष्किंधा, कर्नाटक) माना जाता है। अन्य मान्यताओं में अंजनेरी पर्वत (नासिक, महाराष्ट्र) और गुमला (झारखंड) का भी उल्लेख मिलता है।
पिता का नाम: वानर राज केसरी (सांसारिक पिता) और पवन देव/वायु देव (आध्यात्मिक पिता)।
माता का नाम: माता अंजनी।
भाई: ब्रह्मांड पुराण के अनुसार हनुमान जी के 5 छोटे भाई थे:
मतिमान
श्रुतिमान
केतुमान
गतिमान
धृतिमान
पत्नी का नाम: सुवर्चला (मान्यता है कि वे सूर्य देव की पुत्री थीं। हनुमान जी ने उनसे विवाह केवल अपनी शिक्षा पूर्ण करने के लिए किया था, लेकिन वे आजीवन ब्रह्मचारी ही रहे)।
पुत्र का नाम: मकरध्वज (माना जाता है कि लंका दहन के समय हनुमान जी के पसीने की एक बूंद को एक मछली ने निगल लिया था, जिससे मकरध्वज का जन्म हुआ)।
प्रमुख अस्त्र : गदा जो उन्हें कुबेरजी ने दी थी और वो गदा का नाम था कौमुदिनी।(उनकी गदा को 'लौह स्तंभ' के समान शक्तिशाली माना जाता है)
वाहन: हनुमान जी का कोई पशु वाहन नहीं है क्योंकि वे स्वयं वायु के समान तीव्र गति से उड़ सकते हैं। हालांकि, कुछ विशेष तांत्रिक चित्रणों में उन्हें प्रेत या ऊंट पर सवार दिखाया जाता है।
प्रमुख क्षेत्र : किष्किंधा (वे सुग्रीव के मंत्री थे)।
ईष्ट देव: भगवान श्री राम।
अमरत्व: हनुमान जी उन 8 'चिरंजीवियों' में से एक हैं जिन्हें अमर होने का वरदान प्राप्त है।
विद्या: हनुमान जी ने सूर्य देव से सभी वेदों और विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया था।
हनुमान जी के वे 12 चमत्कारी नाम जिनका पाठ करने से व्यक्ति के सभी संकट दूर हो जाते हैं और हर कार्य में सफलता मिलती है, इस प्रकार हैं:
हनुमान (जिनके जबड़े टूटे हुए हों)
अंजनीसुत (माता अंजनी के पुत्र)
वायुपुत्र (पवन देव के पुत्र)
महाबल (अत्यंत बलशाली)
रामेष्ट (श्री राम के प्रिय)
फाल्गुन सखा (अर्जुन के मित्र - महाभारत युद्ध के दौरान वे अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान थे)
पिंगाक्ष (लाल या भूरी आंखों वाले)
अमितविक्रम (असीमित पराक्रम वाले)
उदधिक्रमण (समुद्र को लांघने वाले)
सीताशोकविनाशन (माता सीता के शोक को दूर करने वाले)
लक्ष्मणप्राणदाता (लक्ष्मण जी के प्राण बचाने वाले)
दशग्रीवदर्पहा (रावण के घमंड को तोड़ने वाले)
शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति सोते समय, यात्रा पर जाते समय या किसी विशेष कार्य की शुरुआत से पहले इन 12 नामों का स्मरण करता है, उसके जीवन से डर और परेशानियां दूर हो जाती हैं। हनुमान जी की कृपा से उसे आर्थिक, मानसिक और शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।
"आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च"
श्री कष्टभंजन देव सुंदरकांड सत्संग मंडल ट्रस्ट (SKDSSM) की आधिकारिक वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत है!
श्रद्धा, भक्ति और सेवा की इस पवित्र त्रिवेणी में हम आपका स्वागत करते हैं। वर्ष 2005 में गांधीनगर के वाવોલ में पूज्य गुरुजी श्री अश्विनकुमार पाठकजी की प्रेरणा से शुरू हुआ यह मंडल आज 1400 से अधिक संगीतमय सुंदरकांड पाठों के माध्यम से पूरे भारत में भक्ति का प्रकाश फैला रहा है।
हमारी वेबसाइट पर आप हमारे ट्रस्ट की विभिन्न गतिविधियों के बारे में जान सकते हैं:
आध्यात्मिक आयोजन: निःशुल्क संगीतमय सुंदरकांड पाठ और भजन संध्या।
भविष्य का संकल्प: भव्य श्री राम मंदिर का निर्माण।
समाज सेवा: जरूरतमंदों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्नदान की सेवा।
जीव दया: गौ-सेवा और पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था।
हमारे साथ जुड़ने और इस सेवा यज्ञ में सहभागी होने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आइए, हम सब मिलकर भक्ति के आलोक में मानवता की सेवा करें।
जय श्री राम | जय हनुमान
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સ્વાગત સંદેશ
"આત્મનો મોક્ષાર્થં જગદ્ધિતાય ચ"
શ્રી કષ્ટભંજન દેવ સુંદરકાંડ સત્સંગ મંડળ ટ્રસ્ટ (SKDSSM) ની સત્તાવાર વેબસાઇટ પર આપનું હાર્દિક સ્વાગત છે!
શ્રદ્ધા, ભક્તિ અને સેવાની આ પવિત્ર ત્રિવેણીમાં અમે આપને આવકારીએ છીએ. વર્ષ ૨૦૦૫માં ગાંધીનગરના વાવોલ ખાતે પૂજ્ય ગુરુજી શ્રી અશ્વિનકુમાર પાઠકજીની પ્રેરણાથી શરૂ થયેલું આ મંડળ આજે ૧૪૦૦ થી વધુ સંગીતમય સુંદરકાંડ પાઠ દ્વારા ભારતભરમાં ભક્તિનો પ્રકાશ ફેલાવી રહ્યું છે.
અહીં આપને અમારા ટ્રસ્ટની વિવિધ ગતિવિધિઓ જેવી કે:
ધાર્મિક આયોજન: નિઃશુલ્ક સંગીતમય સુંદરકાંડ પાઠ અને ભજન સંધ્યા.
ભવિષ્યનો સંકલ્પ: ભવ્ય શ્રી રામ મંદિરનું નિર્માણ.
સમાજ સેવા: જરૂરિયાતમંદોને શિક્ષણ, આરોગ્ય અને અન્નદાનની સેવા.
જીવદયા: ગૌસેવા અને પક્ષીઓ માટે ચણ-પાણીની વ્યવસ્થા.
અમારી સાથે જોડાવા અને આ સેવા યજ્ઞમાં સહભાગી થવા બદલ આપનો ખૂબ ખૂબ આભાર. આવો, આપણે સૌ સાથે મળીને ભક્તિના અજવાળે માનવતાની સેવા કરીએ.
જય શ્રી રામ | જય હનુમાન
महर्षि ऋषि वाल्मीकि जी ने वाल्मीकि रामायण में भी कहा हे की;
"सुन्दरे सुन्दरो रामः सुन्दरे सुन्दरी कथा, सुन्दरे सुन्दरी सीता सुन्दरे सुन्दरं वनम्"।
"सुन्दरे सुन्दरं काव्यं सुन्दरे सुन्दरः कपिः,सुन्दरे सुन्दरं मन्त्रं सुन्दरे किं न सुन्दरम्"॥
जिस सुन्दरकाण्ड के विषयमें ऐसा कहा गया है कि सुन्दरकाण्ड में सब से सुन्दर भगवान श्रीराम और श्रीसीता माता - जगदम्बा है, भगवान का जो वन में विचरण हो रहा है वो भी सब से सुन्दर वन हे और उसकी सब से अलग सब से सुन्दर और दिव्य कथा सुन्दर-कपिश्री हनुमानजी महाराज- उनके द्वारा माता सीताजी की खोज हो रही हैं । उसकी कथा जिस काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है वो काव्य, और हर एक चौपाई भी इतनी सुन्दर हे, और हनुमानजी के चरित्र द्वारा प्राप्त होने वाला प्रत्येक मन्त्र ये सबकुछ सुन्दर हैं। सुन्दरकाण्ड में इसलिए कहा गया है –सुन्दरे किं न सुन्दरम् । सुन्दरकाण्ड में क्या सुन्दर नहीं है ?
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस की कथा सुन्दरकाण्ड का पाठ हो तो उसके द्वारा हनुमानजी आदि दिव्य पात्रों के द्वारा प्रेरित होकर हम अपने आचरण को सुन्दर बनाये और श्रीराम के प्रति अनुराग तथा भगवान में प्रेम-भक्ति ये ही सुगन्धहै और ऐसा सुगन्धपूर्ण सुन्दर जीवन हो । सुन्दरी सीता और सुन्दर रामको हम सुन्दर ढंग से समर्पित करे । जो सुन्दर में सुन्दर ऐसे कपि श्री हनुमानजी की कृपा निरन्तर हम पर बनी रहें ।
संत शिरोमणि श्री तुलसीदास जी द्वारा रचित रामायण के सात कांड मे से पांचवा अध्याय सुन्दरकाण्ड हे, कहा जाता हे की, हनुमानजी को जल्द प्रसन्न करने के लिए सुंदरकांड का पाठ किया जाता है और इस पाठ को करने वाले व्यक्ति के जीवन में खुशियों का संचार होने लगता है.
हिंदू शास्त्रों के अनुसार हमारे हनुमानजी चिरंजीवी हे और आज भी यह भू-लोक में ही जीवित हे और गंधमादन पर्वत पर उनका स्थान माना जाता हे, हनुमानजी का इस कलियुग में जीवित रहनेका एक कारण यह भी हे की कलियुगी प्रभाव बढ़ने लगे, जब इन्सानो का ह्रदय आर्तनाद करने लगे तब हनुमानजी को याद करने से पवनपुत्र अनिष्टों का संघार हेतु अवश्य आएंगे। और यह मिथ्य नहीं है, हनुमानजी ही हे जो डट कर खड़े हो जाते हे आपत्ति के सामने और हमें आंच नहीं आने देते। जब ये लाइन लिखी जा रहे हे तब भी, सिर्फ हनुमानजी के नाम मात्र से हमारे रोंगटे खड़े हो जा रहे हे, और ये प्रभाव हे हनुमान जी का।
सुन्दरकाण्ड की एक-एक चौपाई में इतना दम हे की वो जीवन की हर एक आधी व्याधि उपाधि हर एक आपत्ति -विपत्ति दुःख दर्द का विनाश करने की क्षमता हे, बस एक श्रद्धा होनी चाहिए। और इसीलिए ही तो उसे जड़ीबूटी कहा गया हे। जरा सोचिये की कलियुग में भी और जब वैज्ञानिक तौर से कोई भी प्रूफ न होने के बावजूद भी इतने सारे लोग क्यों सुन्दरकाण्ड में रूचि रखते होंगे।
सुन्दरकाण्ड का प्रभाव हमने देखा हे, अनुभव भी किया हे, और हम लोग यकीन के साथ कहते हे की आपके जीवन से निगेटिव्स को हटाने के लिए धैर्य और श्रद्धा से सुन्दरकाण्ड का पाठ कीजिये, हमारे हनुमानजी आपकी सभी आपत्तियों को दूर करेंगे। समय लग सकता हे, किन्तु परिणाम निश्चित हे।
(1) इस कांड को क्यों बोला गया सुंदरकांड?
हनुमानजी, सीताजी की खोज में लंका गए थे और लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर बसी हुई थी. त्रिकुटाचल पर्वत यानी यहां तीन पर्वत थे पहला सुबैल पर्वत, जहां के मैदान में युद्ध हुआ था। दूसरा नील पर्वत, जहां राक्षसों के महल बसे हुए थे और तीसरे पर्वत का नाम है सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका थी। इसी वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की भेंट हुई थी। इस कांड की यही सबसे प्रमुख घटना थी इसलिए इसका नाम सुंदरकांड रखा गया है.
(२) शुभ अवसरों पर भी सुंदरकांड किया जाता हे ?
शुभ अवसरों पर गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड का पाठ किया जाता है। शुभ कार्यों की शुरुआत से पहले सुंदरकांड का पाठ करने का विशेष महत्व माना गया है। किसी व्यक्ति के जीवन में ज्यादा परेशानियां हो, कोई काम नहीं बन पा रहा हो या फिर आत्मविश्वास की कमी हो या कोई और समस्या हो, सुंदरकांड के पाठ से शुभ फल प्राप्त होने लग जाते हैं, कई ज्योतिषी या संत भी विपरित परिस्थितियों में सुंदरकांड करने की सलाह देते हैं.
(३) सुंदरकांड का पाठ विशेष रूप से क्यों किया जाता हैं?
माना जाता है कि सुंदरकांड के पाठ से हनुमानजी प्रसन्न होते हैं। सुंदरकांड के पाठ में बजरंगबली की कृपा बहुत ही जल्द प्राप्त हो जाती है। जो लोग नियमित रूप से सुंदरकांड का पाठ करते हैं, उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं। इसमें हनुमानजी ने अपनी बुद्धि और बल से सीता की खोज की है। इसी वजह से सुंदरकांड को हनुमानजी की सफलता के लिए याद किया जाता है।
(४) सुंदरकांड से मिलता है मानसिक लाभ?
वास्तव में श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड की कथा सबसे अलग हैं। संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम के गुणों और उनके पुरुषार्थ को दर्शाती हैं. सुंदरकांड एकमात्र ऐसा अध्याय है जो श्रीराम के भक्त हनुमान की विजय का है। मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला कांड हैं। सुंदरकांड के पाठ से व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती हैं, किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए आत्मविश्वास मिलता है।
(५) सुंदरकांड से मिलता है धार्मिक लाभ?
सुंदरकांड से मिलता है धार्मिक लाभ, हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी गई है। बजरंगबली बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता हैं, शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताए गए हैं. इन्हीं उपायों में से एक उपाय सुंदरकांड का पाठ करना है।
आवश्यक सुचना (डिस्क्लेमर): उपर्युक्त हमारा अनुभव और हमारी मान्यता हे, आपका अनुभव, आपकी श्रद्धा पर आधारित हे और वो अलग या विपरीत भी हो सकता हे। इसीलिए आपकी मर्जी हे, हम लोग हमेशा से ही व्यर्थ चर्चा से अपने आपको दूर रखना चाहेंगे। धन्यवाद !
हनुमान जी की गदा के पीछे की कहानी उनके बचपन और देवताओं द्वारा दिए गए वरदानों से जुड़ी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी की गदा उन्हें धन के देवता कुबेर ने उपहार स्वरूप दी थी।
यहाँ इसकी पूरी जानकारी दी गई है:
जब हनुमान जी बालक थे, तब उन्होंने सूर्य को फल समझकर अपने मुँह में भर लिया था। उन्हें रोकने के लिए देवराज इंद्र ने उन पर 'वज्र' से प्रहार किया, जिससे उनकी ठुड्डी (Hanu) पर चोट लगी और वे बेहोश होकर गिर पड़े।
अपने पुत्र की यह दशा देख पवन देव ने क्रोधित होकर पूरे ब्रह्मांड की वायु (हवा) रोक दी। जब सृष्टि पर संकट छा गया, तब ब्रह्मा जी सहित सभी देवताओं ने हनुमान जी को होश में लाया और उन्हें अपनी-अपनी शक्तियाँ और वरदान दिए।
उसी समय कुबेर देव ने हनुमान जी को दो विशेष वरदान दिए थे:
उन्होंने हनुमान जी को अपनी दिव्य गदा प्रदान की।
उन्होंने वरदान दिया कि युद्ध में हनुमान जी को कोई भी पराजित नहीं कर पाएगा और उनकी यह गदा हमेशा शत्रुओं का संहार करेगी।
कुछ ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि देवताओं के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा ने हनुमान जी के लिए अजेय शस्त्रों का निर्माण किया था, जिनमें यह गदा भी शामिल थी। उन्होंने वरदान दिया था कि विश्वकर्मा द्वारा बनाए गए किसी भी शस्त्र से हनुमान जी को कोई हानि नहीं होगी।
हनुमान जी की गदा को केवल एक शस्त्र नहीं, बल्कि 'धर्म और शक्ति' का प्रतीक माना जाता है। यह गदा इतनी शक्तिशाली है कि इसके एक प्रहार से बड़े-बड़े पर्वतों को चूर्ण किया जा सकता है।
रोचक तथ्य: हनुमान जी अपनी इस गदा को हमेशा अपने दाहिने हाथ में नहीं रखते, बल्कि वे इसे अपनी इच्छानुसार छोटा या बड़ा भी कर सकते हैं।
"अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता॥"
हनुमान चालीसा की एक प्रसिद्ध चौपाई है:
इसका अर्थ है कि माता सीता ने हनुमान जी को यह वरदान दिया था कि वे किसी को भी 8 सिद्धियाँ और 9 निधियाँ दे सकते हैं। आइए इनके बारे में विस्तार से जानते हैं:
सिद्धियाँ वे आध्यात्मिक या अलौकिक शक्तियां हैं जिनसे कोई भी असंभव कार्य किया जा सकता है।
अणिमा (Anima): अपने शरीर को एक अणु (atom) के समान अत्यंत छोटा कर लेने की शक्ति। (जैसे लंका में प्रवेश करते समय हनुमान जी ने मच्छर जैसा रूप लिया था)।
महिमा (Mahima): अपने शरीर को असीमित रूप से विशाल कर लेने की शक्ति। (जैसे समुद्र लांघते समय और सुरसा के सामने उन्होंने किया था)।
गरिमा (Garima): अपने शरीर के भार (वजन) को असीमित रूप से भारी कर लेने की शक्ति। (जब भीम उनकी पूंछ नहीं उठा पाए थे)।
लघिमा (Laghima): अपने शरीर को पंख के समान अत्यंत हल्का कर लेने की शक्ति, जिससे वे वायु में उड़ सकते थे।
प्राप्ति (Prapti): बिना किसी रोक-टोक के कहीं भी चले जाना और भविष्य की बातों को जान लेना। पशु-पक्षियों की भाषा समझना।
प्राकाम्य (Prakamya): पृथ्वी की गहराइयों में उतर जाना, आकाश में उड़ना और मन की इच्छा के अनुसार किसी भी वस्तु को प्राप्त कर लेना।
ईशित्व (Ishitva): ईश्वर के समान प्रभुत्व प्राप्त करना। पूरी सृष्टि पर नियंत्रण रखने की क्षमता।
वशित्व (Vashitva): किसी को भी अपने वश में कर लेने की शक्ति। इन्द्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण।
निधियाँ कुबेर देव के खजाने की नौ प्रमुख संपत्तियां मानी जाती हैं, जो सुख और समृद्धि प्रदान करती हैं।
पद्म निधि : सात्विक गुणों से युक्त धन, जो वंश परंपरा को बढ़ाता है।
महापद्म निधि : यह निधि धार्मिक दान और पुण्य कार्यों की ओर प्रेरित करती है।
शंख निधि : यह निधि स्वयं के सुख और ऐश्वर्य के लिए धन प्रदान करती है।
मकर निधि : यह अस्त्र-शस्त्र और कलाओं में निपुणता देती है।
कच्छप निधि : यह व्यक्ति को अपने धन को सुरक्षित रखने और धैर्य रखने की शक्ति देती है।
मुकुंद निधि : यह संगीत, कला और राजसी सुखों में रुचि जगाती है।
कुंद निधि : यह व्यापार और सोने-चांदी जैसी धातु के लेन-देन में लाभ देती है।
नील निधि : यह रत्न और मोतियों के व्यापार में सहायक होती है।
खर्व निधि : यह अन्य सभी निधियों का मिश्रण है और शत्रुओं पर विजय दिलाती है।
हनुमान जी के पास ये सभी शक्तियां हैं, लेकिन वे इनका उपयोग केवल श्री राम के कार्य के लिए और धर्म की रक्षा के लिए ही करते हैं। माता सीता ने उन्हें यह शक्ति दी थी कि वे अपने भक्तों को भी ये निधियाँ और सुख प्रदान कर सकें।